http://astrologywithkanujbishnoi.com/nh4p20sgrss58qu03ajc5hcvlpmut6.html
loader

ज्योतिष लेख

  • Home    >
  • ज्योतिष लेख
blog_img

ग्रह बाधा के पूर्व संकेत !

ग्रह अपना शुभाशुभ प्रभाव गोचर एवं दशा-अन्तर्दशा-प्रत्यन्तर्दशा में देते हैं । जिस ग्रह की दशा के प्रभाव में हम होते हैं, उसकी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल हमें मिलता है । जब भी कोई ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल प्रबल रुप में देने वाला होता है, तो वह कुछ संकेत पहले से ही देने लगता है । ऐसे ही कुछ पूर्व संकेतों का विवरण।

सूर्य के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

सूर्य अशुभ फल देने वाला हो, तो घर में रोशनी देने वाली वस्तुएँ नष्ट होंगी या प्रकाश का स्रोत बंद होगा । जैसे – जलते हुए बल्ब का फ्यूज होना, तांबे की वस्तु खोना । किसी ऐसे स्थान पर स्थित रोशनदान का बन्द होना, जिससे सूर्योदय से दोपहर तक सूर्य का प्रकाश प्रवेश करता हो । ऐसे रोशनदान के बन्द होने के अनेक कारण हो सकते हैं । जैसे – अनजाने में उसमें कोई सामान भर देना या किसी पक्षी के घोंसला बना लेने के कारण उसका बन्द हो जाना आदि । सूर्य के कारकत्व से जुड़े विषयों के बारे में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । सूर्य जन्म-कुण्डली में जिस भाव में होता है, उस भाव से जुड़े फलों की हानि करता है । यदि सूर्य पंचमेश, नवमेश हो तो पुत्र एवं पिता को कष्ट देता है । सूर्य लग्नेश हो, तो जातक को सिरदर्द, ज्वर एवं पित्त रोगों से पीड़ा मिलती है । मान-प्रतिष्ठा की हानि का सामना करना पड़ता है । किसी अधिकारी वर्ग से तनाव, राज्य-पक्ष से परेशानी । यदि न्यायालय में विवाद चल रहा हो, तो प्रतिकूल परिणाम । शरीर के जोड़ों में अकड़न तथा दर्द । किसी कारण से फसल का सूख जाना । व्यक्ति के मुँह में अक्सर थूक आने लगता है तथा उसे बार-बार थूकना पड़ता है । सिर किसी वस्तु से टकरा जाता है । तेज धूप में चलना या खड़े रहना पड़ता है । !

चन्द्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

जातक की कोई चाँदी की अंगुठी या अन्य आभूषण खो जाता है या जातक मोती पहने हो, तो खो जाता है । जातक के पास एकदम सफेद तथा सुन्दर वस्त्र हो वह अचानक फट जाता है या खो जाता है या उस पर कोई गहरा धब्बा लगने से उसकी शोभा चली जाती है । व्यक्ति के घर में पानी की टंकी लीक होने लगती है या नल आदि जल स्रोत के खराब होने पर वहाँ से पानी व्यर्थ बहने लगता है । पानी का घड़ा अचानक टूट जाता है । घर में कहीं न कहीं व्यर्थ जल एकत्रित हो जाता है तथा दुर्गन्ध देने लगता है । उक्त संकेतों से निम्नलिखित विषयों में अशुभ फल दे सकते हैं -> माता को शारीरिक कष्ट हो सकता है या अन्य किसी प्रकार से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है । नवजात कन्या संतान को किसी प्रकार से पीड़ा हो सकती है । मानसिक रुप से जातक बहुत परेशानी का अनुभव करता है । किसी महिला से वाद-विवाद हो सकता है । जल से जुड़े रोग एवं कफ रोगों से पीड़ा हो सकती है । जैसे – जलोदर, जुकाम, खाँसी, नजला, हेजा आदि । प्रेम-प्रसंग में भावनात्मक आघात लगता है । समाज में अपयश का सामना करना पड़ता है । मन में बहुत अशान्ति होती है । घर का पालतु पशु मर सकता है । घर में सफेद रंग वाली खाने-पीने की वस्तुओं की कमी हो जाती है या उनका नुकसान होता है । जैसे – दूध का उफन जाना । मानसिक रुप से असामान्य स्थिति हो जाती है ।

मंगल के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

भूमि का कोई भाग या सम्पत्ति का कोई भाग टूट-फूट जाता है । घर के किसी कोने में या स्थान में आग लग जाती है । यह छोटे स्तर पर ही होती है । किसी लाल रंग की वस्तु या अन्य किसी प्रकार से मंगल के कारकत्त्व वाली वस्तु खो जाती है या नष्ट हो जाती है । घर के किसी भाग का या ईंट का टूट जाना । हवन की अग्नि का अचानक बन्द हो जाना । अग्नि जलाने के अनेक प्रयास करने पर भी अग्नि का प्रज्वलित न होना या अचानक जलती हुई अग्नि का बन्द हो जाना । वात-जन्य विकार अकारण ही शरीर में प्रकट होने लगना । किसी प्रकार से छोटी-मोटी दुर्घटना हो सकती है ।

बुध के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

व्यक्ति की विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है अर्थात् वह अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ रहता है । सूँघने की शक्ति कम हो जाती है । काम-भावना कम हो जाती है । त्वचा के संक्रमण रोग उत्पन्न होते हैं । पुस्तकें, परीक्षा के कारण धन का अपव्यय होता है । शिक्षा में शिथिलता आती है ।

गुरु के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

अच्छे कार्य के बाद भी अपयश मिलता है । किसी भी प्रकार का आभूषण खो जाता है । व्यक्ति के द्वारा पूज्य व्यक्ति या धार्मिक क्रियाओं का अनजाने में ही अपमान हो जाता है या कोई धर्म ग्रन्थ नष्ट होता है । सिर के बाल कम होने लगते हैं अर्थात् व्यक्ति गंजा होने लगता है । दिया हुआ वचन पूरा नहीं होता है तथा असत्य बोलना पड़ता है ।

शुक्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

किसी प्रकार के त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे – दाद, खुजली आदि उत्पन्न होते हैं । स्वप्नदोष, धातुक्षीणता आदि रोग प्रकट होने लगते हैं । कामुक विचार हो जाते हैं । किसी महिला से विवाद होता है । हाथ या पैर का अंगुठा सुन्न या निष्क्रिय होने लगता है ।

शनि के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

दिन में नींद सताने लगती है । अकस्मात् ही किसी अपाहिज या अत्यन्त निर्धन और गन्दे व्यक्ति से वाद-विवाद हो जाता है । मकान का कोई हिस्सा गिर जाता है । लोहे से चोट आदि का आघात लगता है । पालतू काला जानवर जैसे- काला कुत्ता, काली गाय, काली भैंस, काली बकरी या काला मुर्गा आदि मर जाता है । निम्न-स्तरीय कार्य करने वाले व्यक्ति से झगड़ा या तनाव होता है । व्यक्ति के हाथ से तेल गिर जाता है । व्यक्ति के दाढ़ी-मूँछ एवं बाल बड़े हो जाते हैं । कपड़ों पर कोई गन्दा पदार्थ गिरता है या धब्बा लगता है या साफ-सुथरे कपड़े पहनने की जगह गन्दे वस्त्र पहनने की स्थिति बनती है । अँधेरे, गन्दे एवं घुटन भरी जगह में जाने का अवसर मिलता है ।

राहु के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

मरा हुआ सर्प या छिपकली दिखाई देती है । धुएँ में जाने या उससे गुजरने का अवसर मिलता है या व्यक्ति के पास ऐसे अनेक लोग एकत्रित हो जाते हैं, जो कि निरन्तर धूम्रपान करते हैं । किसी नदी या पवित्र कुण्ड के समीप जाकर भी व्यक्ति स्नान नहीं करता । पाला हुआ जानवर खो जाता है या मर जाता है । यारदाश्त कमजोर होने लगती है । अकारण ही अनेक व्यक्ति आपके विरोध में खड़े होने लगते हैं । हाथ के नाखुन विकृत होने लगते हैं । मरे हुए पक्षी देखने को मिलते हैं । बँधी हुई रस्सी टूट जाती है । मार्ग भटकने की स्थिति भी सामने आती है । व्यक्ति से कोई आवश्यक चीज खो जाती है ।

केतु के अशुभ होने के पूर्व संकेत-

मुँह से अनायास ही अपशब्द निकल जाते हैं । कोई मरणासन्न या पागल कुत्ता दिखायी देता है । घर में आकर कोई पक्षी प्राण-त्याग देता है । अचानक अच्छी या बुरी खबरें सुनने को मिलती है । हड्डियों से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है । पैर का नाखून टूटता या खराब होने लगता है । किसी स्थान पर गिरने एवं फिसलने की स्थिति बनती है । भ्रम होने के कारण व्यक्ति से हास्यास्पद गलतियाँ होती हैं ।

योगिनी दशा-

उत्तर भारत में प्रचलित दशाओं में योगिनी दशा का अपना ही महत्त्व है! आज भी प्राचीन संस्कारी ज्योतिष वर्ग इस दशा का प्रयोग कर सटीक भविष्यवाणी करते है!! बृहतपराशर के अनुसार योगिनी दशा का रहस्य भगवान शिव ने माता पार्वती जी को उजागर किया था! कुल मिलकर आठ प्रकार की योगिनियाँ होती है जबकि तंत्र में 64 योगिनियाँ होती है जिन्हें योगी सिद्ध करते है!! इन सभी आठो योगिनियों का कुल दशाकाल 36 वर्ष होता है और 36 वर्ष का एक चक्र पूर्ण होने के पश्चात् पुनः उसी क्रम में द्वितीय चक्र शुरू होता है और बार-बार होता है!!

योगिनी -------- स्वामी ग्रह -------- दशाकाल
मंगला --------- चंद्रमा -------------- 1 वर्ष
पिंगला ----------- सूर्य --------------- 2 वर्ष
धान्या ------------ गुरु --------------- 3 वर्ष
भ्रामरी ----------- मंगल ------------- 4 वर्ष
भद्रिका -----------बुध -----------------5 वर्ष
उल्का ------------ शनि -------------- 6 वर्ष
सिद्धा ------------- शुक्र --------------- 7 वर्ष
संकटा ------------ राहु --------------- 8 वर्ष

योगिनी दशा भी विशोंतरी दशा की तरह नक्षत्र पर आधारित है! प्रत्येक योगिनी की महादशा में प्रथम अन्तर्दशा उसी योगिनी की होती है और क्रमशः उसके बाद की योगिनियों की अन्तर्दशाये एक निश्चित समय के बाद आती रहती है!!

योगिनी दशा की गर्णा -

जन्म पत्रिका में चन्द्र जिस नक्षत्र का है उसकी क्रम संख्यां में तीन जोड़कर आठ से भाग करें ( 8 योगिनियों को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है यदि 27 को 3 से भाग देंगे तो 3 शेष बचता है ) शेषफल ऊपर दी गयी तालिका के अनुसार योगिनी के क्रम को इंगित करेगा !! उदहारण के लिए चन्द्र तुला राशि में 16 अंश और 40 मिनट का है तो चन्द्र के भोगंशो से पता लगता है की चन्द्र स्वाति नक्षत्र में है ,जिसकी क्रम संख्या 15 है अब 15 में 3 योग करेंगे तो 18 हुआ और 18 को 8 से भाग देने पर शेष बचा 2 !! अतः जन्म समय पर 2सरी योगिनी अर्थात पिंगला की दशा होगी!!

क्रमशः ...... योगिनी दशाओं के परिणाम !! मुहूर्त एवं शकुन विचार-माला -

जन्म पत्रिका में चन्द्र जिस नक्षत्र का है उसकी क्रम संख्यां में तीन जोड़कर आठ से भाग करें ( 8 योगिनियों को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है यदि 27 को 3 से भाग देंगे तो 3 शेष बचता है ) शेषफल ऊपर दी गयी तालिका के अनुसार योगिनी के क्रम को इंगित करेगा !! उदहारण के लिए चन्द्र तुला राशि में 16 अंश और 40 मिनट का है तो चन्द्र के भोगंशो से पता लगता है की चन्द्र स्वाति नक्षत्र में है ,जिसकी क्रम संख्या 15 है अब 15 में 3 योग करेंगे तो 18 हुआ और 18 को 8 से भाग देने पर शेष बचा 2 !! अतः जन्म समय पर 2सरी योगिनी अर्थात पिंगला की दशा होगी!!

  1. अन्धलोचन - रोहिणी,पुष्य,उत्तरा फाल्गुनी,विशाखा, पूर्वाषडा,धनिष्ठा और रेवती ,,, ये सात नक्षत्र अन्धलोचन नक्षत्र है इन नक्षत्रों में खोई वस्तु शीघ्र मिल जाती है और प्रायः इसकी(वस्तु की) पुनप्राप्ति पूर्व दिशा से होती है।
  2. मंदलोचन - मृगशिरा,अश्लेशा,हस्त,अनुराधा,उत्तराषडा,शतभिषा,अश्विनी ,, ये सात नक्षत्र मंदलोचन है। इन नक्षत्रों में खोई वस्तु प्रयत्न करने से मिल जाती है और प्रायः इसकी(वस्तु की) पुनप्राप्ति उत्तर या दक्षिण दिशा से होती है।
  3. मध्यलोचन - आद्रा,मघा,चित्रा,ज्येष्ठा,अभिजित,पूर्व भाद्रपद और भरणी ,, ये सात नक्षत्र मध्यलोचन है। इन नक्षत्रों में खोई वस्तु का पता तो चल जाता है लेकिन वस्तु वापिस नहीं मिल पाती।
  4. सुलोचन - पुनर्वसु,पूर्वफाल्गुनी,स्वाति,मूल,श्रवण,उत्तराभाद्रपद और कृतिका ,, ये सात नक्षत्र सुलोचन है। इन नक्षत्रों में खोई वस्तु कदापि वापिस नहीं मिल पाती।

कुंडली वास्तव में क्या है ?-

कुंडली पृथ्वी का छोटा रूप है. किसी निश्चित जन्म समय पर पृथ्वी के किस हिस्से में अंतरिक्ष के किस ग्रह क़ी कितनी किरण पड़ रही थी, इसे ही पृथ्वी के लघु रूप कुंडली में दिखाया जाता है. कुंडली का लग्न भाव उत्तर दिशा होता है. और इस प्रकार लग्न से आगे चलते हुए अग्नि, वायव्य आदि कोण के क्रम से आठ भावो तक जाता है. दिशाएँ सिर्फ दस ,,, चार कोण, चार दिशा एवं एक ऊपर तथा दूसरा नीचे, ही होती है. किन्तु यह हमारा भ्रम है. दिशाएँ उनचास होती है. इसीलिए तुलसी दास जी ने राम चरितमानस में लिखा है कि जब हनुमान जी ने लंका को जलाना शुरू किया तों उनचासो पवन बहने लगे थे. “हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास. अट्टहास करि गरजा कपि आगि बढ़ी लगी आकाश.—–(सुन्दर काण्ड) महाद्वीप सात है. इन पवनो को सातो महाद्वीपों में समान विभाजन से एक महाद्वीप को सिर्फ सात ही दिशाएँ मिलती है. ये ही सात दिशाएँ कुंडली में वर्णित होती है. सात ऊपर एवं सात नीचे. इस प्रकार कुल चौदह भाव होना चाहिए. किन्तु अब सवाल उठता है कि कुंडली में तों मात्र बारह ही भाव होते है. ये चौदह कहाँ से हो गये? कथन एवं संदेह बिल्कुल सत्य है. इसका निराकरण यह है कि जो हिस्सा पृथ्वी के नीचे पड़ता है वह चिपटा होने के कारण आधा पृथ्वी के इस तरफ तथा आधा पृथ्वी के दूसरी तरफ हो जाता है. किन्तु रहता तों वह एक ही हिस्सा है. इसी प्रकार पृथ्वी के ऊपर के हिस्से का भी होता है. इस प्रकार भाव चौदह न होकर मात्र बारह ही सिद्ध होते है. शास्त्र में इसे इस प्रकार बताया गया है कि जिस भाव से गणना क़ी जाती है उसे भी लेकर आगे क़ी गणना क़ी जाती है. इसीलिए ज्योतिष में गणना एक से नहीं बल्कि शून्य से क़ी जाती है. अर्थात जब भाव गणना होती है तब पहले एक से लेकर सातवें भाव तक कुंडली का आधा भाग होता है. और फिर सातवें से लेकर बारहवें तक दूसरा हिस्सा होता है. अर्थात सातवाँ भाव दोनों बार गणना में आजाता है. इस प्रकार चौदह भाव होने के बावजूद भी प्रत्यक्ष रूप से भाव बारह ही होते है. जिस प्रकार नक्षत्र वास्तव में अट्ठाईस होते है. जिसमें अभिजित क़ी गणना नहीं होती है. तथा व्यवहार में मात्र सत्ताईस ही आते है. अभिजित नक्षत्र को छोड़ दिया जाता है. इस प्रकार कुंडली में मात्र बारह ही भाव सिद्ध होते है. इन्ही दिशाओं के क्रम को कुंडली में स्थिर कर के उन उन हिस्सों में ग्रहों को दर्शा दिया जाता है. चार दिशाएँ, चार कोण, एक ऊपर, एक नीचे, एक नीचे का तिर्यक तथा दूसरा ऊपर का तिर्यक. यह तिर्यक दिशा-भाव पृथ्वी के टेढ़े या अपने अक्ष पर झुकी होने के कारण होता है. इस प्रकार बारह भाव होते है. इनमें तिर्यक भाव टेढ़े होने के कारण हमेशा विपरीत फल देने वाले होते है. इसे ही ज्योतिष या कुंडली में आठवां एवं बारहवां भाव कहा गया है. अपने अक्ष पर पृथ्वी के झुके होने के कारण ही प्रतिवर्ष अयनांश 54 विकला विचलित हो जाता है.पृथ्वी का ऊपरी हिस्सा चपटा एवं झुका है. इसीलिए दोनों चपटे हिस्से दो अतिरिक्त दिशाओं का रूप लेलेते है. और इस प्रकार चार मुख्य दिशाएँ, चार कोण, एक ऊपर, एक नीचे और दो झुकाने के कारण बनी दिशाएँ- ये सब मिलकर बारह दिशाएँ हो जाती है. इन्हें ही कुंडली में बारह भावो के रूप में दर्शाया जाता है. तिर्यक या झुके होने के कारण ये अतिरिक्त दोनों दिशाएं केवल गणना के लिये ही है. वास्तव में ये कभी अच्छा फल नहीं देती है।

अन्य ज्योतिष लेख