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ज्योतिष लेख

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राहु सदैव बुरा फल नहीं देता !!

राहु पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है। कुंडली में यह जिस राशि और ग्रह के साथ में होता है उसके अनुसार फल देता है। राहु पाप ग्रह होने के कारण हमेशा बुरा फल दे यह जरूरी नही है। कुंडली में धन प्राप्त हाने के योग भी राहु के द्वारा बन सकते हैं|

अष्टलक्ष्मी योग- जब किसी कुंडली में राहु छठे भाव में होता है और 1, 4, 7, 10वें भाव में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग बनता है। पापी ग्रह राहु, गुरु के समान अच्छा फल देता है। यह योग जिसकी कुण्डली में होता है वह व्यक्ति धार्मिक, आस्तिक एवं शान्त स्वभाव वाला होता है और यश व सम्मान के साथ-साथ धनवान हो जाता है।

लग्न कारक योग- अगर किसी का लग्न मेष, वृष या कर्क लग्न है तभी यह योग बनता है। कुण्डली में राहु दुसरे, 9वें या दसवें भाव में नहीं है तो उनकी कुंडली में ये योग होता है। कुंडली की इस स्थिति से राहु का अशुभ प्रभाव नही होता क्योंकि इन लग्न वालों के लिए राहु शुभ फल देने वाला होता है। ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है।

राहुकोप मुक्त योग- राहु पहले भाव में हो या तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में होता है और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यह योग बनता है। ऐसे में व्यक्ति पर राहु के अशुभ प्रभाव नही पड़ते। ऐसे व्यक्तियों के सभी काम आसानी से होते हैं और उनके जीवन में कभी पैसों की कमी नही होती। राहु की महादशा लगने पर मानते हैं कि जैसे सब कुछ खत्म हो गया।


ग्रहण दोष के भ्रामकता से सावधान रहें !!

सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना ,धारण करना आदि .ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं !पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया .अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है!!

अब ग्रहण क्या होता है ?राहु व केतु का सूर्य या चन्द्र के साथ युति करना आमतौर पर ग्रहण मान लिया जाता है।ज्योतिष में बड़े जोर शोर से इसकी चर्चा होती है,बिना सोचे समझे इस दोष के निवारण बताये जाने लगते हैं।बिना यह जाने की ग्रहण दोष बन रहा है तो किस स्तर का और वह क्या हानि जातक के जीवन में दे रहा है या दे सकता है? राहु केतु एक राशि का भोग १८ महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं।इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे ,वर्ष भर में साठ दिन हो गए !यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है,यानी दुनिया की एक तिहाई आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है?अब कई ज्योतिषियों द्वारा राहु केतु की दृष्टि भी सूर्य चन्द्र पर हो तो ग्रहण दोष होता है .माना जाता है कि राहु केतु अपने स्थान से पांच सात व नौवीं दृष्टि रखते हैं।यानी आधे से अधिक आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है? मेरे मतानुसार ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु व केतु सूर्य/चंद्रमा से युति कर रहे हैं .इस में भी जब दोनों ग्रह एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है और इस के अनुसार संसार के लगभग दस प्रतिशत से कम जातक ही ग्रहण दोष का कुफल भोगते हैं!अन्य प्रकार की युतियाँ कुछ असर डाल सकती है।किन्तु किसी भी भ्रमित करने वाले ज्योतिषी से सावधान रहें जो ग्रहण दोष के नाम पर आपको ठग रहा है .दोष है तो उपाय अवश्य है किन्तु यह बहुत संयम के साथ करने वाला कार्य है !मात्र तीस सेकंड में टी .वी पर बिना आपकी कुंडली देखे ग्रहण दोष सम्बन्धी यंत्र आपको बेचने वाले ठगों से सचेत रहें !! सूर्य हमारी कार्य करने की क्षमता का ग्रह है,हमारे सम्मान ,हमारी प्रगति का कारक है .राहु के साथ जब भी यह ग्रहण दोष बनाता है तो देखिये इसके क्या परिणाम होते हैं .राहु जाहिर रूप से बिना धड का ग्रह है ,जिस के पास स्वाभाविक रूप से दिमाग का विस्तार है .यह सोच सकता है,सीमाओं के पार सोच सकता है .बिना किसी हद के क्योंकि यह बादल है!जिस कुंडली में यह सूर्य को प्रभावित करता है वहाँ जातक बिना कोई सार्थक प्रयास किये ,कल्पनाओं के घोड़े पर सवार रहता है .बार बार अपनी बुद्धि बदलता है .आगे बढने के लिए हजारों तरह की तरकीबों को आजमाता है किन्तु एक बार भी सार्थक पहल उस कार्य के लिए नहीं करता, कर ही नहीं पाता क्योंकि प्लान को मूर्त रूप देने वाला धड उसके पास नहीं है .अब वह चिडने लगता है .पैतृक धन बेमतलब के कामों में लगाने लगता है,आगे बढ़ने की तीव्र लालसा के कारण चारों तरफ हाथ डालने लगता है और इस कारण किसी भी कार्य को पूरा ही नहीं कर पाता .हाथ में लिए गए कार्य को (किसी भी कारण) पूरा नहीं कर पाता ,जिस कारण कई बार अदालत आदि के चक्कर उसे काटने पड़ते हैं .सूर्य की सोने जैसी चमक होते हुए भी धूम्रवर्णी राहु के कारण उसकी काबिलियत समाज के सामने मात्र लोहे की रह जाती है. उसकी क्षमताओं का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता .अब अपनी इसी आग को दिल में लिए वह इधर उधर झगड़ने लगता है.पूर्व दिशा उसके लिए शुभ समाचारों को बाधित कर देती है .पिता से उसका मतभेद बढने लगता है .स्वयं को लाख साबित करने की कोशिश भी उसे परिवार की निगाह में सम्मान का हक़दार नहीं होने देती .घर बाहर दोनों जगह उसकी विश्वसनीयता पर आंच आने लगती है .वहीँ दूसरी और केतु (जिस के पास सिर नहीं है ) से सूर्य की युति होने पर जातक बिना सोचे समझे कार्य करने लगता है .यहां वहां मारा मारा फिरता है .बिना लाभ हानि की गणना किये कामों में स्वयं को उलझा देता है .लोगों के बहकावे में तुरंत आ जाता है . मित्र ही उसका बेवक़ूफ़ बनाने लगते हैं!! इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे- पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं . चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि !! वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस आवेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी ख़ास नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है.राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकार की दुश्वारियों का कारण बनता है . अतः एक ज्योतिषी की जिम्मेदारी है की जब भी किसी कुंडली का अवलोकन करे तो इस दोष पर लापरवाही ना करे .उचित मार्गदर्शन द्वारा जातक को इस के उपचारों से परिचित कराये .किस दोष के कारण जातक को सदा जीवन में किन किन स्थितियों में क्या क्या सावधानियां रखनी हैं ताकि इस का बुरा प्रभाव कम से कम हो!! अपनी कुंडली अपने विश्वस्त और योग्य ज्योतिषी को दिखाकर ही ग्रहण दोष के उपाय करें !!


कब होगा भाग्योदय ??

हर रोज की भागदौड़ ,हर पल के परिश्रम के बावजूद जब उचित मुकाम हम नहीं पाते या अपनी मेहनत का सही मुआवजा हमें नहीं मिलता तो ह्रदय स्वत्तः ही यह सोचने पर मजबूर हो जाता है की क्या हमारे जीवन में भी कोई ऐसा समय आएगा,या ऐसा कौन सा समय काल होगा जब हमें अपने प्रयासों का सही फल मिलने लगेगा.काश ऐसा कोई तरीका होता जो हमें यह बता पता की अमुक समय हमारी भाग्य दशा के अनुकूल है! कुंडली में लग्न से नवां भाव भाग्य स्थान होता है.भाग्य स्थान से नवां भाव अर्थात भाग्य का भी भाग्य स्थान पंचम भाव होता है.द्वितीय व एकादश धन को नियंत्रित करने वाले भाव होते हैं.तृतीय भाव पराक्रम का भाव है.अततः कुंडली में जब भी गोचरवश पंचम भाव से धनेश ,आयेश,भाग्येश ,व पराक्रमेश का सम्बन्ध बनेगा वो ही समय आपके जीवन का शानदार समय बनकर आएगा.ये सम्बन्ध चाहे ग्रहों की युति से बने चाहे आपसी दृष्टि से बने.मान लीजिये की वृश्चिक लग्न की कुंडली है.अब इस कुंडली में गुरु चाहे मीन राशि में आये ,या कहीं से भी मीन राशि पर दृष्टि डाले,साथ ही शनि भी चाहे मीन राशि पर आये या उस पर दृष्टि रखे,एवम इसी समीकरण में जब जब भी चन्द्रमा मीन पर विचरण करे या दृष्टिपात करे वह दिन व वह समयकाल उस अनुपात से शानदार परिणाम देने लगेगा! इसी क्रम में एक सूत्र और,किसी भी कुंडली में जब जब भी तृतीय स्थान का अधिपति अर्थात पराक्रमेश अपने से भाग्य भाव में अर्थात कुंडली के ग्यारहवें भाव विचरण करने लगें तो समझ लीजिये की ये वो समय है जब जातक जितना अधिक मेहनत करेगा उतना अधिक आय प्राप्त करेगा.यहीं से जब पराक्रमेश अपने से दशम यानि लग्न से द्वादश भाव में जाएगा ,जरा सी भी मेहनत जातक के काम धंधे|


केवल भाग्यशाली लोगों को होता है कन्या संतान योग!!

कन्या संतान उन्हीं लोगों के होती है जो परम भाग्यवादी योग वाले होते हैं, भारतीय संस्कृति में कहा गया है "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहीं देवता निवास करते हैं। आज स्थिति यह आ पहुंची है कि कन्या के गर्भ में आते ही उसकी हत्या कर दी जाती है। धर्मशास्त्र में भ्रूण हत्या और विशेषकर कन्याभ्रूण हत्या महापाप माना जाता है और महापाप करने वाला कभी जीवन में खुश नहीं रह सकता। चाहे उसके पास भौतिक संसाधन कितने ही हो जाएं।ज्योतिषशास्त्र में भी स्त्री एवं पुरुष भाग में बारह राशियां एवं सारे ग्रह विभाजित हैं। सूर्य, मंगल, गुरु पुरुष ग्रह हैं तो चंद्रमा, शुक्र, शनि स्त्रीग्रह हैं। बुध नपुंसक है तथा जिसके साथ बैठ जाता है वैसा ही फल प्रदान करने लग जाता है। राशियां भी छह स्त्री और छह पुरुष होती हैं। प्रकृति एवं ब्रम्हाण्ड में सभी जगह दो शक्तियों का संतुलन बना रहता है। यही संतुलन ही आनंद देता है, असंतुलन तो अशांति प्रदान करता है! ज्योतिष शास्त्र में भी स्त्रीग्रह बलवान तभी माने जाते हैं जब उनका संबंध पुरुष ग्रहों से रहता है। चाहे स्थान संबंध हो, दृष्टि संबंध या अन्योन्याश्रय संबंध। ठीक वैसे ही समाज में भी परिवार एवं व्यक्ति की शोभा तब तक ही है, जब तक दाम्पत्य में खुशहाली हो और गृहलक्ष्मी परम प्रसन्न हो। ग्रह, नक्षत्र एवं राशियों के संबंध भी हमारे पारिवारिक एवं सामाजिक रिश्तों की तरह नाजुक होते हैं। जैसे ग्रहयोग होते हैं हमारी चित्तवृत्ति भी वैसी ही बन जाती है। आजकल रिश्तों की मधुरता एवं मर्यादा तथा धर्मशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, व्यावहारिक शास्त्र आदि की महत्ता को हमने कन्याभ्रूण हत्या द्वारा लगभग समाप्त कर दिया है। शास्त्रों में तो कहा गया है - दस कुएं बनाने पर जो पुण्य मिलता है वह एक बावड़ी बनाने पर


शनिदेव की महिमा !!

दुनिया की कुल आबादी का 40 प्रतिशत भाग हमेशा क्रूर ग्रह शनि देव की गिरफ्त में रहता है। हर समय 5 राशियों के लोग सीधे-सीधे शनि से प्रभावित रहते हैं। शनि को न्याय का देवता माना जाता है लेकिन शनिदेव अति क्रूर ग्रह है। यदि किसी व्यक्ति से कोई गलत और अधार्मिक कार्य हो गया है तो शनि उसके पाप का बुरा फल जरूर देता है। यह फल शनि साढ़ेसाती और ढैय्या के समय व्यक्ति के जीवन को पूरी तरह प्रभावित करता है। शनि का प्रभाव सभी राशियों पर पड़ता है लेकिन इसका 5 राशियों पर अत्यधिक सीधा प्रभाव होता है। शनि एक मात्र ऐसा ग्रह है जो सीधे-सीधे एक साथ पांच राशियों को पूरी तरह प्रभावित करता है। इन राशियों में तीन राशियों पर शनि की साढ़े साती होती है और दो राशियों पर शनि की ढैय्या। ज्योतिष के अनुसार दुनिया की आबादी 12 राशियों में ही विभाजित है। अत: 12 में से 3 राशियों पर शनि की साढ़ेसाती और 2 राशियों पर शनि ढैय्या हर समय चलती रहती है। साढ़ेसाती और ढैय्या में शनि की सीधी नजर संबंधित राशि पर ही रहती है।शनि की साढ़ेसाती: शनि की साढ़ेसाती का मतलब यह है किसी राशि को शनि साढ़े सात साल तक प्रभावित करता है। वैसे तो शनि किसी भी राशि में ढाई वर्ष (2 साल 6 माह) ही रुकता है परंतु इसका प्रभाव आगे और पीछे वाली राशियों पर भी पड़ता है। इस तरह प्रति राशि के ढाई वर्ष के अनुसार एक राशि को शनि साढ़े सात वर्ष प्रभावित करता है। शनि की साढ़ेसाती को तीन हिस्सो में विभक्त किया जाता है। एक-एक भाग ढाई-ढाई वर्ष का होता है।शनि की ढैय्या: शनि की ढैय्या अर्थात् किसी राशि पर शनि का प्रभाव ढाई साल तक रहना। शनि जिस राशि में स्थित है उस राशि से ऊपर की ओर चौथी राशि और नीचे की ओर छठी राशि में भी शनि की ढैय्या रहती है। अभी शनि तुला राशि में स्थित है और उसकी ढैय्या कर्क और मीन पर भी चल रही है।किसी व्यक्ति से कोई गलत और अधार्मिक कार्य हो गया है तो शनि उसके पाप का बुरा फल जरूर देते है। यह फल शनि साढ़ेसाती और ढैय्या के समय व्यक्ति के जीवन को पूरी तरह प्रभावित करता है।शनि के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए काले कुत्ते को रोटी दी जाती है। लेकिन शनि के अशुभ फल को दूर करने के लिए काले कुत्ते को ही चपाती क्यों दें? यह जिज्ञासा अक्सर लोगों के मन में होती है और जब उन्हें इसका उचित जवाब नहीं मिलता तो वे इसे अंधविश्वास मान लेते हैं। दरअसल इस उपाय को करने का कारण यह है शनि को श्याम वर्ण माना जाता है अर्थात् शनि देव स्वयं काले रंग के हैं और वे काले रंग के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही वराह संहिता के अनुसार काले कुत्ते को शनि का वाहन माना गया है। शनि को सेवा करने वाले और वफादार लोग पसंद होते हैं और काले कुत्ते में ये दोनों ही गुण होते हैं इसलिए शनि को प्रसन्न करने के लिए काले कुत्ते को तेल से लगी हुई चपाती देने की मान्यता है!शास्त्रों में शनि को न्याय का देवता बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि वह न्याय करने के साथ दण्ड भी देते हैं। यहीं नहीं शास्त्रों में शनि की वक्रदृष्टि से अनेक देवी-देवताओं के आहत होने का भी वर्णन है। इन कार्यों और रूपों से ही शनि क्रू र देवता माने जाते हैं। शास्त्रों के मुताबिक शनि सूर्य पुत्र हैं। किंतु माँ का अपमान के कारण उनका अपने पिता सूर्य से बैर हुआ। माता के अपमान न सहन कर पाने से शनि ने शिव की तपस्या कर सूर्य की भांति ही शक्तिशाली और नौ ग्रहों में श्रेष्ठ स्थान पाने का वर प्राप्त किया। असल में शनिदेव की क्रूर छबि का मतलब यह नहीं है कि वह कष्ट, पीड़ा और दु:खों को देने वाले ही देवता है। बल्कि सत्य यह है कि शनिदेव बुरे कर्मों का ही दण्ड देते हैं। चूंकि हर व्यक्ति जाने-अनजाने मन, वचन और कर्म से कोई न कोई पाप कर्म कर ही देता है। इसलिए वह शनि के कोप का भागी भी बनता है। शनिदेव बुरे कामों के लिए सजा भी देते हैं तो अच्छे कामों से प्रसन्न भी होते हैं। यही कारण है कि शनि को किस्मत चमकाने वाला देवता भी कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक शनि शुभ होने पर अपार सुख, समृद्धि देता हैं। साथ ही भाग्य विधाता भी बन जाता है!!


शिवलिंग पूजा का महत्त्व !!

शिव उपासना से जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को दूर किया जा सकता है। शिव का स्वरूप व चरित्र ही नहीं बल्कि सारा शिव परिवार संतुलन और जीने की कला सिखाता है। शिव का वाहन बैल है तो पार्वती का सिंह। शिव के पुत्र गणेश का वाहन चूहा और कार्तिकेय का मोर है। शिव का जीवन ओघड़ की तरह है, जबकि माता पार्वती राजकन्या थी। इतने विरोधाभास के बाद भी शिव परिवार की भक्ति आनंद और सुख देने वाली है। यह गृहस्थ जीवन के लिए आदर्श है। शिव पूजा गृहस्थ ही नहीं निराशा और परेशानियों से जूझ रहे हर व्यक्ति के लिए बहुत शुभ फल देती है। इसलिए सोमवार के दिन कामनाओं को पूरा करने वाले शिवलिंग पूजा से अनेक तरह की पीड़ा और दु:ख भी दूर हो सकते हैं!सोमवार को पंचमुखी शिवलिंग पर तीर्थ का जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इससे गंभीर रोग से पीडि़त व्यक्ति भी रोगमुक्त हो जाता है।सोमवार के दिन शिवलिंग का शहद से अभिषेक करने पर रोजगार और धन की इच्छा पूरी होती है। परिवार में कलह फैला हो तो सोमवार के दिन गाय के दूध से शिव का अभिषेक करें। दु:ख और कष्टों के कारण बुरी हालात से गुजर रहा व्यक्ति शिवलिंग का श्रृंगार लाल चंदन से करें। रोली का प्रयोग कतई न करे। शिवलिंग पर आंकड़े का फूल और धतूरा चढ़ाने से व्यर्थ के विवाद या शासकीय बाधाओं से मुक्ति मिलती है। दूध में भांग मिलाकर चढ़ाने से जीवन में किसी समस्या से हो रही उथल-पुथल थम जाती है। जीवन को तनावमुक्त और शांत रखने के लिए शिव पूजा का एक उपाय सबसे आसान है,शिव को पवित्र जल और बेलपत्र चढ़ाएं!!!

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