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ज्योतिष लेख

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अस्त ग्रहों का प्रभाव !!

जन्म कुंडली का विश्लेषण करते समय अस्त ग्रहों पर भी विचार करना चाहिए। कुंडली में पाये जाने वाले अस्त ग्रहों का अपना एक प्रभाव होता है एवं एक ज्योतिषी का इस पर विचार करना आवश्यक होता है। अस्त ग्रहों का विश्लेषण किए बिना कुंडली का फलित अस्ात्य भी हो सकता है। सबसे पहले ये जानते हैं कि ग्रह अस्त क्यों होते हैं?आकाश मंडल में कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित अंशात्मक दूरी के मध्य आ जाता है तो सूर्य के तेज व ताप से वह ग्रह अपनी आभा व शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह आकाश मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है तथा इस ग्रह को अस्त ग्रह का नाम दिया जाता है। प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह निकटता अंशों में नापी जाती है जोकि इस प्रकार है-

चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। मंगल सूर्य के दोनों ओर 17अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। बुध सूर्य के दोनों ओर 13(मतान्तर से 14अंश) अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। यदि बुध वक्री हो तो वह सूर्य के दोनों ओर 12अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। गुरू सूर्य के दोनों ओर 11अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। शुक्र सूर्य के दोनों ओर 9अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। यदि शुक्र वक्री हो तो वह सूर्य के दोनों ओर 8अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। शनि सूर्य के दोनों ओर 15अंश या इससे अधिक निकट आने पर अस्त कहलाता है। राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते।

किसी भी ग्रह के अस्त होने की स्थिति में उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है और वह सुचारू रुप से फल नहीं दे पाता है। अस्त ग्रह निष्फल होते हैं मानों उनकी शक्ति ही उनसे छिन्ा गई हो।फलित करते समय कोई ग्रह कितना अस्त है इसका ज्ञान होना आवश्यक है। ग्रह जितना अधिक अस्त होगा उतना फल देने में निष्फल होगा। गणना करके यह ज्ञात किया जा सकता है कि कोई ग्रह कितने प्रतिशत अस्त है। इसके लिए अस्त ग्रह की सूर्य से दूरी देखना आवश्यक होता है। तत्पश्चात ही उस ग्रह की कार्यक्षमता के बारे में सही ज्ञान होता है। मान लो कि चन्द्रमा सूर्य से 12अंश दूर होने पर भी अस्त होगा एवं 1अंश दूर होने पर भी अस्त होगा, परन्तु पहली स्थिति में कुंडली में चन्द्रमा का बल दूसरी स्थिति के मुकाबले अधिक होगा क्योंकि जितना ही कोई ग्रह सूर्य के निकट आ जाता है, उतना ही उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। फलित करते समय कुण्डली में अस्त ग्रहों का अध्ययन सजगता के साथ करना चाहिए। यदि अस्त होने वाला ग्रह सूर्य का मित्र हो तो कम हानि और यदि शत्रु हो तो अधिक हानि करेगा। अस्त ग्रहों को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तथा कुंडली में किसी अस्त ग्रह का स्वभाव देखने के बाद ही यह निर्णय किया जाता है कि उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल कैसे प्रदान किया जा सकता है।

यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ-साथ प्रकृति से शुभ फलदायी है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करने का सबसे सरल व प्रभावशाली उपाय है, जातक को उस ग्रह विशेष का रत्न धारण करवाना। रत्न का वज़न अस्त ग्रह की बलहीनता का सही अनुमान लगाने के बाद ही निर्धारित किया जाता है। रत्न धारण से अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल मिल जाता है और वह अपना कार्य भलीभांति करता है। किन्तु यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ प्रकृति से अशुभ फलदायी है तो ऐसे ग्रह को रत्न द्वारा अतिरिक्त बल प्रदान नहीं कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में रत्न का प्रयोग वर्जित है, चाहे ग्रह कितना भी क्षीण हो। इस स्थिति में उसकी क्षमता बढ़ाने का प्रभावशाली उपाय उस ग्रह का मंत्र जाप होता है। मंत्र का निरंतर जाप करने से ग्रह को अतिरिक्त बल तो मिलता ही है एवं उसका प्रकृति भी अशुभ से शुभ हो जाती है। कुंडली में किसी अस्त तथा अशुभ फलदायी ग्रह के लिए सर्वप्रथम उसके बीज मंत्र का सवालाख जाप से पूजा करनी चाहिए तथा बाद में उस मन्त्र का नियमित रूप से जाप करना चाहिए। नवग्रहों के बीज मंत्र अधोलिखित हैं-

  1. सूर्य - ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:
  2. चन्द्र - ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्राय नम:
  3. मंगल - ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
  4. बुध - ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:
  5. गुरू - ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:
  6. शुक्र - ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:
  7. शनि - ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:
  8. राहु - ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:
  9. केतु - ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:

अस्त ग्रह कुण्डली में हों तो योग्य ज्योतिषी से सलाह लेकर उसका उपाय करना चाहिए!!


आपकी कुंडली में अकस्मात ( शेयर-सट्टा या लॉटरी ) धन-लाभ के योग है या नहीं ??

जन्मकुंडली से यह भली-भांति यह पता लग सकता है कि सट्टा, लॉटरी या शेयर्स से लाभ है या नहीं। किसी योग्य ज्योतिष को कुंडली दिखाकर यह विचार कर लेना चाहिए कि इस क्षेत्र से लाभ की संभावना है या नहीं। हर कोई जानता है कि आजकल शेयर-सट्टा भी धनार्जन के लिए होता है। लेकिन यह ध्यान रहे कि प्रत्येक व्यक्ति न शेयर क्रय कर सकता है और न सट्टा खेल सकता है। प्रत्येकव्यक्ति की लॉटरी भी नहीं निकल सकती है। जो लोग बिना सोचे-समझे इस क्षेत्रा में हाथ अजमाते हैं वे धनहानि के बाद पछताते हुए कहते हैं-अच्छा ही था कि शेयर न खरीदता या सट्टा न खेलता। मेरा तो दिमाग ही भटक गया था। हानि के बाद जितने मुंह उतनी बातें होने लगती हैं। १. जन्म या चन्द्र लग्न से ३, ६, १०, ११वें भाव में शुभ ग्रह स्थित हों और नवमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो जातक अचानक शेयर, सट्टे या लॉटरी से धनलाभ करता है। २. यदि १, २, ५, ९, १० या ११वें भाव से इनका योग बने-

  1. धनेश और लग्नेश
  2. धनेश और लाभेश
  3. भाग्येश और दशमेश
  4. धनेश और पंचमेश

तो जातक शेयर, लॉटरी एवं सट्टे से लाभ उठाता है।

3. मीन लग्न में पांचवें बुध या एकादश में शनि हो तो लॉटरी, शेयर या सट्टे से लाभ होता है।

4. मेष लग्न में चौथे गुरु, सातवें शनि, आठवें शुक्र, नौवें गुरु एवं दसवें मंगल के साथ पांचवे चन्द्र हो तो जातक शेयर, सट्टे या लाटरी से लाभ उठाता है।

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