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ज्योतिष लेख

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फलित ज्योतिष में गोचर का महत्त्व !!

ग्रह अपने-अपने मार्ग से व अपनी अपनी गति से सदैव सूर्य के चारों ओर घूमते रहते हैं। इससे ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हुए सूर्य की परिक्रमा पूरी करते हैं। जब जातक का जन्म होता है उस समय ग्रह जिस-जिस राशि का भ्रमण कर रहे होते हैं वह जन्म कुण्डली कहलाती है।

जन्म समय के बाद ग्रह जिस-जिस राशि में भ्रमण करते रहते हैं वह स्थिति गोचर कहलाती है। गो शब्द संस्कृत भाषा की ''गम्‌'' धातु से बना है। गम्‌ का अर्थ है 'चलने वाला' आकाश में अनेक तारे है। वे सब स्थिर हैं। तारों से ग्रहों को पृथक दिखलाने के कारण ग्रहों को गो नाम रखा गया है। चर का अर्थ है 'चलना' अर्थात्‌ अस्थिर बदलने वाला इसलिये गोचर का अर्थ हुआ ग्रहों का चलन अर्थात ग्रहों का परिवर्तित प्रभाव।जन्म कुण्डली में ग्रहों का एक स्थिर प्रभाव है और गोचर में ग्रहों का उस समय से परिवर्तित बदला हुआ प्रभाव दिखलाई पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र में तीन तरह के लग्न प्रचलित हैं-जन्म लग्न, चन्द्र लग्न व सूर्य लग्न।

यह परिवर्तित प्रभाव हमें कहां से देखना चाहिये जन्म लग्न से या चन्द्र लग्न से या सूर्य लग्न से। प्रत्‍येक लग्न का अपना-अपना महत्व है-लग्न शरीर का, चन्द्र मन का और सूर्य आत्मा का प्रतिनिधि है। जातक इन तीनों के समन्वय से बना है। आत्मा शरीर के बिना अपनी अभिव्यक्ति नहीं कर सकती। शरीर का नियन्त्रण मन के हाथ में है मन ही शरीर की ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण करता है। इसलिये चन्द्र लग्न का महत्व बढ़ जाता है।

मन्त्रेश्वर ने भी फलदीपिका में चन्द्र लग्न से गोचर का विचार करने का निर्देश दिया है। सब प्रकार के लग्नों (लग्न, सूर्य लग्न एवं चन्द्र लग्न) के होते हुए भी गोचर विचार में प्रधानता चन्द्र लग्न की ही है। बृहतपाराशर होरा शास्त्र में भी चन्द्र लग्न व जन्म लग्न दोनों को ही महत्‍वपूर्ण बतलाया है और दोनों लग्नों से फलित करने का आदेश दिया है। आधान लग्न सिद्धान्त के अनुसार यह पाया गया है कि चन्द्रमा जन्म लग्न में उसी भाव में गोचर करता है जिस भाव में वह गर्भाधान के समय होता है। अतः महत्व चन्द्र का है। दशा व अन्तर दशा के समय पर दशा नाथ जिस राशि में बैठा होता है उसको लग्न मान कर दशा के शुभाशुभ का विचार होता है।

गोचर अष्टक वर्ग पद्धति का एक अंग है। अष्टक वर्ग लग्न व सात ग्रहों को मिला कर बनता है। अष्टक वर्ग में देखा जाता है कि ग्रह कहां-कहां शुभाशुभ फल दे सकते हैं। यहां पर शुभ व अशुभ फल ग्रहों की परस्पर स्थिति, मैत्री व नैसर्गिक शुभता व अशुभता का ध्यान रखा जाता है। चन्द्रमा से कौन ग्रह शुभ है और कौन ग्रह अशुभ है, यह देखा जाता है। इसलिए महर्षियों ने गोचर फल निर्णय के लिये चन्द्र को चुना जो ग्रह होने के साथ-साथ एक लग्न भी है और लग्न पर भी नियन्त्रण रखता है।

दशा का क्रम भी चन्द्रमा के नक्षत्र के स्वामी से आरम्भ होता है अर्थात्‌ जीवन का आरम्भ भी चन्द्रमा से ही होता है। चन्द्रमा ही जातक के शैशवकाल का कारक है। इसलिये बालारिष्ट में चन्द्रमा की कुण्डली में स्थिति महत्वपूर्ण है। चन्द्रमा से ही गण्डान्त आदि देखा जाता है। चन्द्रमा से ही तिथि का महत्व है। तिथि चन्द्रमा से बनती है। दिन का नक्षत्र भी चन्द्रमा से ही देखा जाता है। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा होता है वही नक्षत्र दिन का भी होता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा का बहुत महत्व है।

तिथि, नक्षत्र मुहूर्त्त, दशा आदि सब कार्य कलाप चन्द्रमा से ही देखे जाते हैं। इसलिये गोचर में भी चन्द्रमा का महत्व बढ़ जाता है। इसलिए महर्षियों ने गोचर का विचार चन्द्रमा से देखने का आदेश दिया।

क्या केवल गोचर से ही फलित कहा जा सकता है? गोचर फलित का एक प्रभावशाली अंग होते हुए भी यह सब कुछ नहीं। हमारे महर्षियों ने यह स्पष्ट कहा है कि जो कुछ कुण्डली में नहीं वह गोचर नहीं दे सकता। गोचर में ग्रह चाहे कितना ही अच्छा योग बनाते हो यदि वह योग कुण्डली में नहीं तो वह गोचर नहीं दे सकता।

उदाहरणतया गोचर तो दशा व अन्तर दशा के अधीन भी कार्य करता है। यदि दशा व अन्तर दशा ऐसे ग्रहों की चल रही हो जो जातक के लिये अशुभ हो परन्तु गोचर शुभ हो तो गोचर का शुभ फल जातक को नहीं मिलता। क्योंकि गोचर में यह देखा जाता है कि जन्म कुण्डली की ग्रह स्थिति से वर्तमान गोचर कुण्डली में ग्रह स्थिति अच्छी या बुरी कैसी स्थिति में है। जो ग्रह जन्म कुण्डली में उत्तम स्थान में पड़ा हो वह गोचर में शुभ स्थान पर आते ही शुभ फल देगा। जो ग्रह जन्म कुण्डली में अशुभ हो वह यदि गोचर में शुभ भी होगा तो भी शुभ फल नहीं देगा। गोचर ग्रह जन्म के ग्रहों से जिस समय अंशात्मक या आसन्न योग करते हैं उस समय ही उनका ठीक फल प्रकट होता है। मान लो शुक्र वृष में 18अंश पर है। गोचर में शुक्र जब वृष 18अंश से योग बनायेगा तब ही शुक्र का अच्छा या बुरा फल प्रकट होगा। इस प्रकार गोचर ग्रह जन्म के ग्रह के अधीन हुआ। यदि गोचर का ग्रह अशुभ भाव में हो जन्म कुण्डली में वह ग्रह उच्च, स्वक्षेत्री हो तो गोचर में वह ग्रह अशुभ फल नहीं देता।

वस्‍तुत: गोचर के नियमों के आधार पर हम कह सकते हैं कि गोचर का फल जन्म कुण्डली के ग्रह स्थिति पर निर्भर करता है। यदि गोचर के अन्य नियमों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि गोचर दशा व अन्तर दशा के भी अधीन है। मूलतः गोचर विचार जन्मकुडली और गोचर कुण्डली दोनों पर निर्भर है। गोचर विचार करते समय ग्रहों की स्थिति का विचार सूर्य, चन्द्र एवं लग्न से करना चाहिए। यदि इनमें से जो सर्वाधिक बली हो तो उससे करना चाहिए। तीनों से ग्रहस्थिति का विचार करके व दशादि विचार कर समन्वय युक्त फल कहना चाहिए।

महादशा, अन्तरदशा एवं प्रत्यन्तरदशा से यह संकेत मिल जाता है कि अमुक घटना इस अवधि में घटेगी। लेकिन यह अवधि महीनों से लेकर कई वर्षों की अवधि है। लेकिन घटना का सही समय निर्धारित करने के लिए गोचर-ज्योतिष का सहारा लेना पड़ता है। किसी भी जातक के जीवन में जब कोई शुभ या अशुभ घटना घट रही होती है तो उस समय जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति से गोचर ग्रह स्थिति का निकटस्थ सम्बन्ध होता है।

वस्तुतः स्पष्ट है कि कोई भी शुभ या अशुभ घटना अनुकूल या प्रतिकूल गोचर ग्रह स्थिति पर ही अवलम्बित होती है। जिस दिन शुभाशुभ घटना घटती है उस दिन की गोचर ग्रह स्थिति शुभ या अशुभ होती है एवं दशा-अन्तरदशा एवं प्रत्यन्तरदशा भी शुभ या अशुभ होती है। निष्‍कर्षत: गोचर विचार बिना ज्‍योतिष में फलित सम्‍भव नहीं है!!

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