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ज्योतिष लेख

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आज भौतिक जगत में ज्योतिष का महत्त्व !!

आज जब विज्ञानं का विकास चरम विकसित रूप में हमारे सामने है और ग्रह नक्षत्रों से लेकर चाँद सितारों को छूने के हमारे प्रयास सफल होते नजर आ रहे है,तो यहाँ ये कहना जरुरी है कि हमारे वेद-शाश्त्र ही इस विज्ञानं और ज्ञान के प्रेरक रहे हैं। सूर्य जगत की आत्मा है, चंद्रमा मन है। मंगल साहस और शौर्य का प्रतीक है। तो बुध जगत की वाणी का प्रतीक और गणित का प्रतीक है। गुरु धर्म और आस्था का प्रतीक तो वहीँ शुक्र जगत में प्रेम और कला का भण्डार है। वही राहु अपनी चालबाजियां लेकर अधर्म के मार्ग पर ले चलने को तैयार भोतिक सुख को पाने के लिए कुछ भी करने को जगत को प्रेरित करता है। शनि ग्रह से कृषि, श्रम और विनाश का आकलन केतु भी अपना गुप्त षड्यंत्र लेकर तैयार है। चंद्रमा का वात्सल्य हमे जीने की प्रेरणा देता है। चंद्रमा ही जो हमे समाज के लिए देश के लिए और मानव जाति के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है।

मानव के आदि और अंत के दो कारण हैं,जन्म और मृत्यु। ये संसार नश्वर है जो पैदा हुआ है उसका मरण भी निश्चित है,परन्तु बिना मौत के भी कुछ लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं, जो अकाल मृत्यु या अपमानित होकर जीते जी मरना। जबकि अपने जप-तप और संयम से हजारो साल तक जीवित रहने वाले मनुष्य की औसत आयु 60-से 70 वर्ष की हो गयी है। अब इसे ही हम दीर्घायु कहते हैं। आयु छोटी हो या लम्बी,जब तक मनुष्य के संचित कर्म उस पर लदे हैं, धर्म,अर्थ,काम के आवरण मनुष्य को ये भी महसूस होता है कि यह आवरण या आचरण भी उसके अपने वश में नहीं है। बल्कि राशी के गुणों नक्षत्रो के गुणों के आधार पर और उसके अधीन हमारा जीवन कर्म और भाग्य सुरक्षित रहता है। अच्छे कर्म और अच्छे विचार भी उसी को प्राप्त होते हैं,जिसके जन्मकालीन ग्रह योग अच्छे होते हैं। हम आज चाहे जिस समाज में रहे या शहर में या गाँव में,सभी जगह असुरक्षा-अस्थिरता और लालच भोग की पिपासा ने मानव मस्तिष्क को डस लिया है।सब कुछ पाने के लिए कामयाबी चाहिए और कामयाबी के लिए चाहिए बुद्धि और परिश्रम, परन्तु इसके बदले आज के समाज में मनुष्य तिकड़म,चालाकी,भ्रष्टाचार ,धूर्तता और अहम् के विचार का प्रसार हो रहा है।झूठ और पाखण्ड अधिक फल-फूल रहा है,सच्चाई धूल चाट रही है।इमानदारी और संतोष के सहारे जीवन जिन जैसे असफलता का मापदण्ड बन गया है। जबकि तर्क,चतुराई और अधर्म आधुनिकता का मापदण्ड। किसी के पास समय नहीं है कि गंभीर तथा जटिल विषयों पर अपना मन केन्द्रित करे। कब मिलेगी सफलता,कब होगा कामयाबी का सिलसिला शुरू,यही सोचना रह गया है आजके युग-पुरुषो का।आधुनिकता के शिकार मनुष्य को आज धर्म-कर्म और न्याय नीति और कुदरत के फैसलों के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं है।बस एक ही रट और धुन सवार है कि किस तरह सफलता प्राप्त हो,किस तरह आगे निकल जाएँ,किस तरह करोडपति बन जाएँ या अरबपति बन जाएँ। किस तरह दुनिया को नचायें या किस तरह वो सब पा लूँ जिसे पाने के बाद किसी और को पाने की चाह न रहे।

इस जिज्ञासा की वजह से या मन की शांति के लिए जातक ज्योतिषियों के पास तांत्रिकों के पास,हस्त्रेखाविद के पास और तीसरी आँख का दावा करने वालों के पास भाग रहा है।लोगो की भीड़ बढ़ रही है,इस भीड़ को रिझाने वाले बढ़ रहे हैं,विज्ञानं भी इनके साथ आ मिला है,वे लोग जो ज्योतिष का क-ख ग भी नहीं जानते वो भी कुण्डलिया बना लेते हैं और चार किताबे पढ़ कर भविष्य-वाणी करने लगते हैं। कोई अजूबा नहीं है ये कलियुग में ये सब होना तय है, अभी तो और विज्ञानं की उन्नति और ज्ञान की अवनति होनी है, विज्ञानं आसमान की बुलंदियों को छुएगा और ज्ञान जमीन पर धूल चाट रहा होगा।बस मात्र आधार पाखंडियों का होगा, इनके आगे कुछ और भी जादूगर अपने चेहरे चमका रहे हैं।किसी को चेहरा पढना आता है तो अपने नाम के आगे त्रिकालदर्शी लिख रहा है। किसी को रहस्यमय आवाज आती है।किसी के पास सिद्धि है तो किसी ने साधना से प्रेत को वश में कर रखा है।कोई पाखंड और भगवे वस्त्रों की आड़ में शोषण कर रहा है।इस सब का एक लक्ष्य है ,भटके इंसान का शोषण करना। प्राचीन-काल में जब भारत ज्ञान-विज्ञानं और विचार से संपन्न था और विश्व में शिक्षा का केंद्र था तो उस वक्त वराहमिहिर और पराशर-मुनि जैसे ऋषि-मुनियो ने संसार को खगोल की जानकारी। आर्य-भट्ट जैसे गणितज्ञ हुए और कालिदास जैसे शाश्त्री जिन्होंने उत्तर-कलामृत जैसे ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की।

कुछ लोग मानते है कि ज्योतिष कुछ नहीं है,उनका तर्क है ग्रह-पिण्ड बहुत दूर हैं और उनका कोई प्रभाव हम पर नहीं पड़ता। शनि राहु-केतु सब कल्पना है मनुष्य की। और इस तथ्य को मानने वाले भी बहुतायत में हैं | आज के परिवेश में जो बदलाव मानवीय चेतना और संवेदनशीलता पर छाता जा रहा है ये सब भी ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा।भौतिकता वाद की पराकाष्ठा के बाद हिलता है प्रकृति का विध्वंशक चक्र और आदमी फिर वहीँ आ जायेगा ,जहाँ से चला था,परन्तु वह समय अभी दूर है। खैर ज्योतिष तब भी जिन्दा रहेगा, पुराने शाश्त्र जिन्दा रहेंगे और भौतिक सुखों के लिए नई-नई खोजों के बावजूद मनुष्य का मन वहीँ पर सकून पायेगा, जहाँ पर धरती की सुरम्य हरियाली की गोद होगी। कल-कल करते झरने ,पहाड़,नदियाँ,खेत-खलिहान ,शाक-सब्जी का चावल-रोटी का आहार होगा,दूध-दही होगा। इनके साथ ही अन्य सब कुछ भी वहीँ आ कर थम जायेगा जहाँ से सफ़र शुरु हुआ था !

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